राजगोपाल संस्कृत महाविद्यालय

Rajgopal Sanskrit Mahavidyalaya
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विद्यालय का संक्षिप्त इतिहास

श्री राजगोपाल संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना सन् 1864 में तत्कालीन महन्त श्री गोपालदास जी महाराज ने की थी । कहा जाता है कि अयोध्या के सर्व प्राचीन विद्यालय श्री वैदिकादर्श संस्कृत महाविद्यालय सरयूबाग अयोध्या ही एक मात्र संस्कृत शिक्षण की संस्था के रूप में संचालित था । उस समय के नियमानुसार महाविद्यालय प्रातः 7 बजे से 12 बजे तक ही संचालित होता था । राजगोपाल मन्दिर में निवास करने वाले संस्कृताध्यायी छात्र वहां पढ़ने जाते थे । यातायात साधनों की अनुपलब्धता तथा विद्यालय की दूरी के कारण छात्र प्रायः मन्दिर में होने वाले मध्यांह्न भोजन से वंचित रह जाते थे । महाराज जी ने छात्रों की इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए मन्दिर में ही संस्कृत पाठशाला खोलने का निर्णय किया और यह संस्कृत पाठशाला स्थापित हो गयी । इसके नियमों को ध्यान में रखते हुए इसका सोसाइटी रजिस्ट्रेशन कराया गया तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से निम्नांकित विषयों में सम्बद्धता प्राप्त की गयी । उत्तर प्रदेश शासन द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर इस महाविद्यालय का प्रथम श्रेणी में वर्गीकरण भी किया गया । सम्प्रति शासन के निर्देशानुसार इस संस्था के दो विभाग हो गये । (1) श्री राज गोपाल संस्कृत महाविद्यालय एवं (2) श्री राज गोपाल संस्कृत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय । उस समय इस संस्था में विभिन्न विषयों के राष्ट्रीय स्तर ख्याति प्राप्त विद्वान इस संस्था में कार्यरत थे । जैसे – प्रधान अध्यापक के रूप में न्याय, व्याकरण के मूर्धन्य विद्वान पं० रूद्र प्रसाद अवस्थी कार्यरत थे । ज्योतिष के मर्मज्ञ विद्वान थे गोपीकान्त झा न्याय के विद्वान सहदेव झा व्याकरण के पारंगत पं० फुल्लेश्वर पाठक, साहित्य के आचार्य रूप नारायण मिश्र तथा वेद के दुर्गादत्त त्रिपाठी उदभट विद्वान अपने–अपने विषयों का शिक्षण कार्य करते रहे । जिनके शिष्य प्रशिष्य आज तक पूरे देश में संस्कृत शिक्षा का गुणात्मक अध्ययन–अध्यापन कर रहे हैं । इसके पूर्व महाविद्यालय में आचार्य चन्द्रधर मिश्र एवं पं० सूर्य नरायन शुक्ल जैसे व्याकरण और न्याय के प्रकाण्ड पं० इस महाविद्यालय के शिक्षक पद की शोभा बढ़ा चुके है । जिनकी योग्यता से प्रभावित होकर इन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में सम्मानित शिक्षक के रूप में आमंत्रित कर नियुक्त किया गया । इतना ही नहीं पं० रूद्र प्रसाद अवस्थी जब यहां से सेवानिवृत्त हुए तो लखनऊ विश्वविद्यालय ने अपने प्राच्य विद्या संकाय में इन्हें वरिष्ठ अध्यापक के रूप में नियुक्ति किया । महाविद्यालय के प्रबन्ध की कुशलता एवं शिक्षा के गुणात्मक प्रसार में अभिरूचि के कारण बाद में श्री आचार्य बैजनाथ द्विवेदी आचार्य ब्रम्हानन्द पाठक, प० कौशल किशोर पाण्डेय, पं० सूर्य लाल पाण्डेय, पं० चन्द्रभाल जी जैसे व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष आदि अनेक शास्त्रीय विषयों के निष्णातः विद्वान इस विद्यालय की गरिमा को बढ़ाते रहे । आचार्य बैजनाथ द्विवेदी प्रदेश शासन से पुरस्कृत भी थे । स्वनामधन्य इन विभूतियों की सत्प्रेरणा से अद्यावधि यह महाविद्यालय शिक्षा की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील है । यहां के अवकाश प्राप्त वेद के विद्वान श्री नारायण झा राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत हो चुके हैं । यह इस बात का प्रमाण है कि संस्था में योग्य क्रियाशील सद्चरित्र एवं विषय के विद्वान शिक्षकों की नियुक्ति की जाने की परम्परा रही है । महाविद्यालय के वर्तमान अध्यक्ष महन्त श्री कौशल किशोर शरण (फलाहारी बाबा) इसके लिए कृत संकल्प हैं । उनके कुशल निर्देशन में महाविद्यालय अपनी गरिमा को अच्क्षुण बनाये हुए प्रगति की ओर अग्रसर है । इस महाविद्यालय में जिस प्रकार योग्य शिक्षकों के गुणात्मक शिक्षण की परम्परा रही है । उसके फलस्वरूप अनेक मेधावी छात्र इसके प्रमाण है । उदाहरण स्वरूप यहाँ के छात्र श्री नृत्यगोपाल दास जी महराज इस समय श्री मणिराम छावनी पीठाधीश्वर एवं श्री रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष के रूप में प्रतिष्ठित एवं अपनी योग्यता और साधुता तथा अनेक परोपकारी कार्यों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है । यहीं के छात्र स्वामी हरियाचार्य जी अपनी विद्वता सप्रदाय निष्ठा के कारण रामानन्द सम्प्रदाय के जगतगुरू पद पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं । अनेक छात्र देश के विख्यात विश्वविद्यालयों में अध्यापक के रूप में कार्यरत है । इसमें लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ० अयोध्या दास एवं राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर में डॉ० उमेश दास इस क्रम में विशेष उल्लेखनीय है । महाविद्यालय में दी जाने वाली धार्मिक एवं सदाचरण की शिक्षा से प्रेरित होकर यहाँ के बहुत से छात्र अयोध्या एवं देश के अनेक तीर्थ् क्षेत्रों में मठ – मन्दिरों के महन्त के रूप में भी धर्म उपदेश कर रहे है । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह संस्था भारतीय संस्कृति के संरक्षण – संवर्धन एवं वैदिक पौराणिक ज्ञान, विज्ञान की समुन्नति जैसे अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल रही है ।
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